Mission statement

घोषणा पत्र 

श्रीपाद अमृत डांगे १२५वाँ जन्म वर्ष उत्सव

श्रीमान श्रीपाद अमृत डांगे एक महान स्वतंत्रता सेनानी,प्रखर देशभक्त , भारत में ट्रेड यूनियन एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक और एक सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक विचारक थे। उनका जन्म 1899 में महाराष्ट्र के नासिक में हुआ था। डांगे की चेतना पर बाल गंगाधर तिलक जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं ने गहरा प्रभाव डाला। वे अपने छात्र जीवन से ही स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ गए।  

डांगे 1917 की ऐतिहासिक महान अक्टूबर रूसी क्रांति से भी प्रभावित हुए। इस प्रकार वे बीसवीं सदी के दो ऐतिहासिक आंदोलनों से प्रभावित हुए, एक तरफ विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन और दूसरी तरफ उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई विदेशी शासन से लड़ाई । उन्होंने न केवल इन दोनों आंदोलनों में भाग लिया, बल्कि उन्होंने इन्हें समझने और इनकी व्याख्या करने में अपनी रचनात्मक प्रतिभा लगाई। उन्होनें एक तरफ़ भारतीय जनता और गांधी जी के सत्याग्रह के बीच मेल देखा और दूसरी तरफ रुसी क्रांति की सफलता। श्री डांगे ने अपनी राजनीतिक सोच की शुरुआत गांधी और लेनिन के बीच तुलना करके की परन्तु बाकी ज़िन्दगी गांधी और लेनिन के विचारों के बीच सामान्य आधार खोजने और समन्वय ढूँढ़ने में लगाई।

इसी कारण से डांगे हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक राजनीतिक विचारकों में से एक हैं। इस वर्ष हम श्री डांगे का 125वाँ जन्म दिवस मना रहे हैं। डांगे की प्रासंगिकता भारतीय क्रांति के सिद्धांतकार के रूप में है । वह समझते थे कि भारत में क्रांतिकारी प्रक्रिया रूस और चीन की तरह नहीं होगी। न ही वे मार्क्स के सिद्धांतों को भारतीय संदर्भ में हठधर्मिता से लागू करने में विश्वास करते थे। इस वजह से, श्री डांगे के काम को समझकर हम भारतीय क्रांतिकारी प्रक्रिया के सही कालक्रम और विचार तक पहुँच सकते हैं। उनकी सोच हमें इस समय के अनेक सवालों पर मार्गदर्शन देती है। भारतीय राज्य व्यवस्था का स्वभाव क्या है और हम इस राज्य व्यवस्था के साथ भारतीय लोगों के रिश्ते को किस रूप में देख सकते हैं? हमें इस समय के क्रांतिकारी संघर्ष और 'समाजवाद' के बीच के रिश्ते को कैसे फिर से परिभाषित करना चाहिए?

डांगे ने भारतीय जनता के वास्तविक हालात का गहरा अध्ययन किया। वह भारतीय जनता की नब्ज़ को पहचानते थे और उनकी चेतना और गति समझते थे। इस वजह से डांगे भारत के लोगों और उनके नेता महात्मा गांधी के बीच द्वंद्वात्मक संबंध को देखने में सक्षम थे। इस मामले में, उनकी आजीवन  सोच कम्युनिस्ट आंदोलन के अन्य विचारकों से अलग थी। उनहोंने गांधीजी को एक क्रांतिकारी के रूप में देखा, और उनके अहिंसक सत्याग्रह के तरीकों को भारतीय जनता के लिए सबसे उपयुक्त रणनीति माना। उन्हें भारतीय लोगों के प्रति गहरा प्रेम और उनकी क्षमताओं में विश्वास था।

डांगे को क्रांति की गहरी समझ थी। वह नहीं मानते थे कि भारतीय आजादी

 एक बुर्जुआ क्रांति थी। उन्होंने इस क्रांति का साम्राज्यवाद-विरोधी होने का गुण और लोगों के बीच इसके आधार को देखा। उन्होंने देखा कि भारतीय परिस्थितियों की विशेषताओं के कारण एक अहिंसक क्रांति आवश्यक थी। साथ ही उन्होंने यह समझा कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का क्रांतिकारी उद्देश्य था ब्रिटिश औपनिवेशिक राज्य-व्यवस्था का शांतिपूर्ण अहिंसक ढंग से समाप्ती ।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान डांगे ने कम्युनिस्ट आंदोलन को कट्टरपंथी, अति-वामपंथी और ‘पेटी-बुर्जुआ’ विचारधारा से दूर धकेलने का प्रयास किया। इस तरह, उन्होंने तिलक, लाला लाजपत राय, सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं को उनकी  पुरानी सोच के बावजूद भी  ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ समझौता करते नहीं देखा। उन्होंने यह स्वीकार करने से इंकार किया कि पूँजीपति वर्ग पूरी दुनिया में एक है, और भारतीय राष्ट्रवादी पूँजीवादी वर्ग के जटिल रूप को गहराई से समझने की आवश्यकता देखी। उनका मानना था कि भारतीय लोगों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए स्वतंत्रता संग्राम के समय सभी प्रगतिशील और क्रांतिकारी ताकतों को कांग्रेस के साथ मिलकर काम करना चाहिए।

आज़ादी के बाद, वे हिंसक तरीकों से राज्य सत्ता पर कब्ज़ा करने और "पूंजीपति वर्ग" को उखाड़ फेंकने के रोमांचक विचार नहीं रखते थे। बल्कि वह मानते थे कि इस लोकतान्त्रिक क्रांति को पूरा करने की ज़रुरत है जो शहादतों और मेहनत से हासिल की गई है. भारतीय राज्य व्यवस्था के साथ जुड़ कर लोगों के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के लिए काम करना होगा। डांगे की कार्यनीति भारतीय राज्य व्यवस्था की सटीक समझ पर आधारित थी। उन्होंने देखा कि भारतीय राज्य व्यवस्था को पुराने उदारवादी या साम्यवादी सिद्धांतों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह समाज के ऊपर सिर्फ़ एक दमनकारी संरचना नहीं थी जिसका इस्तेमाल अन्यथा असभ्य लोगों को व्यवस्था देने के लिए किया जाए, न ही यह केवल वर्ग हितों का एक साधन थी। यह राज्य व्यवस्था भारतीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को पूरा करने का एक साधन थी जिन्होनें स्वतंत्रता संग्राम के माध्यम से अपनी आवाज़ उठाने के लिए संघर्ष किया। इसलिए, डांगे ने भारतीय राज्य व्यवस्था द्वारा बनाए गए ढाँचे में लोकतांत्रिक क्रांति को जारी रखने के लिए लड़ाई लड़ी।

श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार के महत्त्वपूर्ण दौर में डांगे ने इंदिरा गांधी के अनेक कदमों जैसे बैंक राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार और पूंजी की मिल्कियत तथा राष्ट्रीय कर ढाँचे में सुधार का समर्थन किया । उन्होंने 1971 की भारत-सोवियत समझौते को एक प्रगतिशील और साम्राज्यवाद विरोधी कदम के रूप में देखा। उन्होंने इंदिरा गांधी के नेतृत्व को स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को आगे बढ़ाते हुए पाया और उनके प्रति लोगों के प्रेम को पहचाना। उन्होंने कहा कि लोगों के दिल में इंदिरा जी के लिए एक विशेष स्थान था क्योंकि वह एक महिला नेता भी थीं। जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की, तो उन्होंने इसे देश में अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी/डीप स्टेट के साथ मिली हुई ताकतों द्वारा बनाए जा रहे अराजकता और “कलर क्रांति” के माहौल का मुकाबला करने के लिए एक आवश्यक कदम के रूप में देखा। वह अपनी इस समझ पर आजीवन बने रहे जिस कारण उन्हें उसी पार्टी से ही निष्कासित किया गया जिसकी स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका थी। इस मामले में, उनका जीवन निर्मला देशपांडे और कुछ हद तक अरुणा आसफ अली के जीवन के समान है। ये तीनों हस्तियाँ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की वह शाखाएँ थीं जिन्होंने 'संपूर्ण क्रांति' के कृत्रिम दावों को पहचाना। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भारतीय समाज और शासक वर्ग ने एक क्रांति-विरोधी और पश्चिम की ओर देखने वाला मोड़ लिया।

आज जब हम डांगे का मूल्यांकन कर रहे हैं, तो हम सोवियत संघ का पतन और भारतीय अर्थव्यवस्था के नवउदारवादी सुधार शुरू हुए 30 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। इन नवउदारवादी सुधारों ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम के कुछ मूल्यों को नकारने की कोशिश की। हम ऐसा ऐसे समय में कर रहे हैं जब भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन सांप्रदायिकता, धार्मिक भेदभाव , पहचान की राजनीति, गरीबी और  असमानता  माहौल है और यह निरन्तर बढ़ रहा है । इस समय में, हमें डांगे के एकता और संघर्ष के नारे को वापस लाना ज़रूरी है। हमें शांति और लोकतंत्र के पक्ष में सभी ताकतों को एकजुट करने के लिए काम करना चाहिए। साथ ही, हमें सही विचारों और भारत और दुनिया में राजनीतिक स्थिति की सही समझ के लिए संघर्ष करना चाहिए।

कुछ लोगों का मानना है कि प्राथमिक संघर्ष 'संविधान को बचाना' या उदारवादी अधिकार हासिल करना है, लेकिन हमें अपने स्वतंत्रता संग्राम के विचारों के अनुरूप भारतीय लोगों के लिए वास्तविक लोकतंत्र की लड़ाई लड़ना चाहिए। अवसरवादी गठबंधनों के बजाय, हमें उन विचारों के लिए संघर्ष करना चाहिए जो लोगों को एकजुट कर सकें। हमें भारतीय राज्य व्यवस्था को इस तरह से बदलने की कोशिश करनी चाहिए कि यह लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बने, गरीबी उन्मूलन करे और समाजवाद के सपने को साकार करे, जो अंततः वास्तविक लोकतंत्र है।

डांगे ने समझा कि हम भारत के बारे में कूपमंडूक बन कर नहीं सोच सकते और हमें भारत को विश्व इतिहास को बदलने में अपनी भूमिका निभाते हुए देखना चाहिए। इस सन्दर्भ में, हम आज एक ऐतिहासिक और रोमांचक समय में रह रहे हैं और आशा और उम्मीद के अनेक कारण मौजूद हैं। पश्चिमी देश, खासकर अमेरिकी राजनीति और समाज गहरे संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। दूसरी ओर, ब्रिक्स के उभरते देशों के माध्यम से एक नयी लोकतांत्रिक विश्व व्यवस्था जन्म ले रही है। फिर भी, पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप दोनों में संकट और युद्ध जारी है और परमाणु युद्ध की संभावना मंडरा रही है। जब दुनिया का प्रमुख “लोकतंत्र”, फिलिस्तीनी जनता के नरसंहार में सहायता देता है तो सवाल उठता है, “फासीवाद” असल में कहाँ है? बांग्लादेश का उदाहरण दिखाता है कि कैसे एक स्थायी लोकतांत्रिक समाज को, "फासीवाद" से लड़ने के नाम पर, विदेशी शक्तियों की मदद से अस्थिर किया जा सकता है। हमें इन युद्धों और अस्थिरता के पीछे असली अपराधी को पहचानना चाहिए और शांति के लिए संघर्ष करने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

हमें भारतीय जनता को गहराई से समझने की कोशिश करनी होगी। आम भारतीयों को सांप्रदायिक या बहुसंख्यकवादी होने का दोषी ठहराने के बजाय, हमें उन ताकतों के खिलाफ लड़ना चाहिए जो उन्हें गरीबी में रखती हैं। हमें श्री डांगे की तरह लोगों के प्रति प्रेम की भावना से और उनमें एक बुनियादी विश्वास रख कर आगे बढ़ना होगा। लोगों के प्रति इस प्रेम के वजह से डांगे भारतीय परंपरा में रुचि रखते थे और वे भारतीय दार्शनिक परंपरा के बारे में खुलेपन से सोचते थे। हमें एकता, शांति, गरीबी उन्मूलन और एक नई विश्व व्यवस्था के लिए संघर्ष करना होगा। हमें अंततः भारतीय बच्चों के लिए लड़ना होगा ताकि वे भविष्य में अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच सकें।


Mission Statement

Shripad Amrit Dange was a freedom fighter, a nationalist, trade-unionist, founder of the Indian Communist party and a creative tactical and political thinker. Born into a family of nationalist workers, the Indian freedom struggle led by figures such as Tilak deeply shaped Dange’s consciousness. As a student, he threw himself into the freedom struggle. 


Dange was inspired by the historic Russian Revolution of 1917. He was thus shaped by two great world movements of the twentieth century, the world Communist movement on one side, and the anti-colonial struggle on the other. He not only participated in them, but applied his creative genius in trying to understand, interpret and theorize these two movements. He saw, on the one hand, the resonance between the Indian masses and Gandhiji’s satyagraha, and on the other the achievements of the Russian revolution. In this way, Comrade Dange started his political ideas by contrasting Gandhi and Lenin but spent his life in finding the common ground for the ideas of Lenin and Gandhi, and eventual synthesis of their contributions.


For this reason, Dange remains one the most important and relevant political thinkers of our national movement. This year, we are celebrating the 125th anniversary of Comrade Dange’s birth. 


Dange’s importance is as a theorist of the Indian Revolution. He did not believe that the revolutionary process in India would look like the one in Russia and China. Nor did he believe in a dogmatic application of the theories of Marx to the Indian Context. 


Dange studied concretely the conditions of the Indian people. Having his pulse on the consciousness and movement of the people, Dange was able to see the dialectical relationship between the masses of India and their leader in Mahatma Gandhi. In this, he differed from other thinkers of the communist movement throughout his life.. He saw Gandhi as a revolutionary, and his methods of nonviolent civil disobedience to be the tactics most suited to the Indian people. He had a profound and deep love for and belief in the Indian people. He said of their support for Gandhi, “if we do not accept Mahatma Gandhi, Tilak…, then in that case we are not accepting the masses[.”.


Dange had a sophisticated understanding of what constituted a revolution. First, he disagreed with the idea that the Indian revolution was a bourgeois revolution. He saw its anti-imperialist character and saw it as a national democratic revolution. He saw that the particular characteristics of the Indian people necessitated a non-violent revolutionary struggle. Further, he saw in the Indian national movement the revolutionary aim of the non-violent destruction of the British colonial state. He put forward the analysis that the two pillars of the Congress were anti-imperialism and its mass character. Thus, he believed that all progressive and revolutionary forces had to join forces with the Congress at that time to bring about revolutionary transformation among the Indian people.


Throughout the freedom struggle, Dange attempted to push the communist movement towards a fuller understanding of the Indian revolution, and away from immature sectarianism, ultra-leftism and petty bourgeois ideology. In this vein, he did not see Congress leaders such as Vallabhai Patel, Tilak, Dadabhai Naroji, etc as being compromisers with British imperialism because of their so called social conservatism. He rejected the claim that the bourgeoisie class was the same all over the world, and argued for a sophisticated understanding of the Indian nationalist capitalist class. His argument was further based on his observation of the relationship between Mahtama Gandhi, a true representative of the Indian people, and several of these leaders. 


After Independence,  he did not hold romantic ideas of the seizure of state power and a violent overthrow of the “bourgeoisie”. Rather he sought to work with the hard-won Indian state to develop the conditions for the people’s social and political transformation and a completion of the democratic revolution. His practice and tactics were based on an accurate understanding of the nature of the Indian state. He saw that the Indian state did not fit previous liberal or communistic theorizing. It was not just an oppressive structure above society used to bring order to an otherwise savage people, nor was it a blunt instrument of class interest. It was an instrument to further the democratic aspirations of the Indian people who had struggled for their voice to be heard through the freedom struggle. Therefore, Dange fought for the continuation of the democratic revolution in the framework created by the Indian state.


During the critical period of Indira Gandhi’s government, Dange supported Indira Gandhi’s reforms in bank nationalization, land redistribution, capital ownership and the national tax structure. He saw the 1971 Indo-Soviet treaty as a progressive and anti-imperialist step. He saw Indira Gandhi’s leadership as a continuation of the legacy of the freedom struggle, and recognized the people’s love for her. He said the people had a special place in their heart for Indira because she was a woman leader. When the emergency was imposed, he saw it as a necessary step to counter the atmosphere of color revolution and anarchy that was being created in the country by elements that were supported by the American Deep State. For standing up to the American Deep State, he paid the price of being ostracized and thrown out from the very party he had helped found. In this, his life parallels the life of Nirmala Deshpande, and to some extent Aruna Asaf Ali. They constituted the wing of the Indian national movement that saw through the superficial claims of a ‘total revolution’ to see the actions of American intelligence and their comprador class within India. The assassination of Indira Gandhi began a counter-revolutionary, westward looking movement within Indian society and elite. 


Today, when we evaluate Dange, we do so more than 30 years after the collapse of the Soviet Union and the neoliberal reforms of the Indian economy which tried to negate some of the ideas of our freedom struggle. We do so in a time when the Indian economy is growing but in an  atmosphere of sectarianism, religious divide, identity politics, rising inequality and poverty. In this atmosphere, we must come back to Dange’s slogan of unity and struggle. We must work to unite all the forces in favour of peace and democracy. At the same time, we must struggle for correct ideas and a correct understanding of the political situation in India and the world. 


Thus, it is through Comrade Dange’s work that we can come to a proper chronology and understanding of the Indian revolutionary process. His thinking can help guide us on several  questions that confront us in this time. First, what is the nature of the Indian state and how can we theorize the relationship of the Indian state to the Indian people? Second, what is the struggle that must be taken up by the people in the country? Third, how must we reconceptualize the relationship of the revolutionary struggle in this time to the struggle for ‘socialism’?


Some see the primary struggle is to ‘save the constitution’ or win liberal rights but we must fight for a more substantive democracy for the Indian people in the spirit of our freedom struggle. Rather than opportunistic alliances, we must struggle for ideas which can unite the people. We must seek to change the Indian state in a way that makes it more accountable to the people, eliminate poverty and achieve the dream of socialism, which is ultimately democracy. 


Dange understood that we can not think of India in isolation and must see it as playing its part in changing world history. In this sense, we are living in historic and exciting times and there is reason for optimism and hope. There is a deep crisis in the West, especially in the American political scene. On the other hand, a new democratic world order is being born through the emerging countries of BRICS. The relationship between India and China is on an upward slope with profound possibilities for the future. However, deep crisis and war continues both in West Asia and Eastern Europe and the possibility of nuclear war looms. We must understand the real culprit behind these wars and play our role in fighting for peace. 


We must seek to understand the Indian people. Instead of blaming the masses of Indians as being sectarian, majoritarian or communalist, we should fight against the forces that keep them in poverty. We must proceed, like Comrade Dange, from a fundamental belief in and love for the people. We must struggle for unity, for peace, for the elimination of poverty and for a new world order. We must fight, ultimately, for the Indian children so they can reach their full potential in the future.